माँ ये अच्छा होता,
जो तु मुझे जन्म घड़ी ही मार देती,
तो आज तेरी दमिनी के दामन पे
ये कलंक न होता ।
उस समय मैं अबोध थी ।
मैं चुप-चाप मर जाती
पर, आज मैं अकेले तिल-तिल के नहिं मर रही,
बल्कि आज पूरा घर घुट­­­ घुट के जी रहा है ।
ये किस समाज मे जन्म दिया माँ ।
जहा मेरे दुसरे रुप माँ-बहन को सब पूजते है,
पर एक लड़की के रुप मे मुझे घूरते है ।
कभी इस समाज मे न सुकुन से जी सकी मैं
और नाही अकेली राह मे चैन की साँस ले घुम सकी मैं
इस वहसत के साये में तेरी फूल कुचल दी गई है।
उनके अय्याशी मे तेरी फूल लहू से सन गई है ।
अब जाते जाते माँ इतना वरदान दीजो
कि अगले जन्म मोहे बिटिया ना कीजो ॥