सन्नाटे के शोर में जब दिल के कोने से आवाज़ आई,
तो सिर्फ सिसकियाँ ही सुनाई दी
न जाने किस दर्द को बयाँ कर रही थी वो सिसकियाँ
कोई दर्द था भी, या फिर ये सिसकी भी उन भावनाओं की जुबां थी,
जो कभी बहार ही नहीं आई थी, क्या पता

क्योंकि अगर इतना ही आसान होता,
तो यूं शब्दों की तलाश न करता मैं,
कुछ कहने के लिए बोलने का इन्तज़ार न करता मैं
क्योंकि बोल कर कब कौन कुछ कह पाया है,

बिना बोले ही जुबां मिलती होगी उन ख्यालों को,
तभी तो उसने हमें आँखें,
और उन आँखों में समुन्दर सी गहराइयाँ दी हैं

पता नहीं क्या मंज़ूर था उसे, या फिर शायद उसे भी तो नहीं पता था,
और कैसे पता होता,
क्योंकि सन्नाटे के मोहताज़ तो तूफ़ान होते हैं,
भला लहरों के शोर भरे सन्नाटे को भी कोई भेद पाया है ?