चीखों में बदली हैं बातें संगीत बना है शोर
कुछ शांत अगर मिल जाए तो क्या बात है
जल रही है नदियाँ छूटी आंसुवों की डोर
कोई तालाब भिगा जाए तो क्या बात है

छाँव की रेत बिखरी थी कल तक अब पेड़ों की खबर नहीं
ताज़ी पत्ती कहीं दिख जाए तो क्या बात है
जल उठती हैं सांसें काला हुआ असमान
पुरानी हवा अगर छू जाए तो क्या बात है

राख बने हैं खेत सभी सुलग रही है बगिया
एक फूल कहीं खिल जाए तो क्या बात है
बिक रही हैं जिन्दगी यहाँ काँप रहे परिंदे
उड़ता भंवरा कभी दिख जाए तो क्या बात है

कट रहें हैं सिर हर घड़ी सस्ती हो गई जानें
कहीं मुस्कान सच्ची दिख जाए तो क्या बात है
लग रहा है डर हर पहर जिंदा रहना महफूज़ नही
एक कब्र मुझे मिल जाए तो क्या बात है