हर दिन सवेरा होता है ,फिर होती अंधियारी रात .

कभी चलती चंचल बसंत ,कभी फैलता शीत प्रपात.

कभी बरसाता सूरज अंगारे, कभी होती झमाझम बरसात .

अर्ध नग्न सब झेल जाऊंगा ,बस हटा दो परीक्षा का पड़ाव .

इम्तेहान से पहले जीवन चर्या बदलता हूँ .

पाप से भरे घड़े बून्द बून्द खाली करता हूँ .

काश मैं पहले पढ़ लेता ये मैं खुद से कहता हूँ .

पढाई से ज्यादा मैं नक़ल के बारे मैं सोचता हूँ .

किताब के दो अक्षर तोड़ के थका महसूस करता हूँ .

विद्वानों को देखकर मन मैं अफ़सोस जताता हूँ .

खुद का कुछ पता नही , फिर भी दूसरों की तैयारी का हाल पूछता हूँ .

ये तो एक पहलू है ,अब दूसरा पहलू दिखाता हूँ .

जब रात घनी होती है तब मेरी आँखे खुलती है .

क्योंकि दिन मैं तो सिर्फ राजनीति और इतिहास पे चर्चा होती है .

जैसे वक़्त गुजरता है शंका का पारा बढ़ता है .

अब तो सब कुछ मुझे भगवान भरोसे लगता है .

चाहे कुछ समझ ना आये फिर भी किताबो मैं आँखे फोड़ता हूँ .

चमत्कार की आस मैं पूरी रात कोशिश करता हूँ .

खोखली तैयारी के साथ परीक्षा के लिए निकलता हूँ .

चलिए अब आपको परीक्षा हॉल की सैर कराता हूँ .

जब घडी इम्तेहान की आती है , नब्ज़ मेरी थम जाती है .

पर मेरा हाल ऐसा है , जब पर्चा हाथ मैं आता है .

सवालो के देखकर खुद पे ही हंसी छूट जाती है .

तीन घंटो के बाद दिमाग के साथ हाथ मैं भी दर्द हो जाता है.

इतने दर्द के बाद भी पर्चे मैं सिर्फ 35 नंबर ही आते है.

जिसको साथ बिठाता हूँ उसके साथ मैं ‘कुछ तुम करो कुछ मैं करु’ ये पॉलिसी अपनाता हूँ .

इस पॉलिसी से मैं हमेशा घाटा ही पाता हूँ और अपने साथ वाले से हमेशा काम नंबर पाता हूँ .

चलिए अब आपको परीक्षा के बाद का हाल बताता हूँ .

दो दिन तक मैं खुद को कोसा करता हूँ,

उसके बाद घरवालो को अगली बारे के लिए वादा करता हूँ .

फिर सवेरा होता है फिर होती अंधियारी रात

फिर चालू हो जाती है फेसबुक पे लंबी बात और दफ़न हो जाते है पढ़ाई के सारे जज्बात.

और मैं फिर से पछतावा करूँगा जब आएगी परीक्षा की रात .

-SHUKRIT SINGH KUSWAH
IIT (ISM) DHANBAD.

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