बत्ती तो मैंने बुझा दी
मगर अन्दर की आग मुझे सोने नहीं देती
कितने उतार देख लिए
ये चढ़ाव की आस मुझे रोने नही देती
टिक-टिक करता समय चल रहा
धीरे धीरे दिन बदल रहा
दिन बिता फिर आज रात आयी
बत्ती तो मैंने बुझा दी
मगर अन्दर की आग कैसे बुझाएँ

खोया हूँ मगर तलाश रहा
आज चुप होकर ख़ुद को जाँच रहा
वक़्त ने तौला मुझे,अब ख़ुद को मै तौलुंगा
सोचा बत्ती बुझा दूँ,अँधेरे मे आँसूं छुपा लूँगा
मगर ये मंज़िल से आशिकी मुझे रोने नही देती
बत्ती तो मैंने बुझा दी
ये अन्दर की आग मुझे सोने नहीं देती

आज बारिश भी हुई, हालाँकि कम थी
सीने को छुती बूँदें जैसे मरहम थी
गिरता रहा हूँ लेकिन ललक जीत की ज़िन्दा है
कहीं न कहीं मेरे हालातों के लिए मेरी आदतें शर्मिंदा है
उतार फेकूँगा इन मुझसे लिपटी आदतों को
ये आदतें मुझे शर्मिंदगी धोने नहीं देती
आज रात भी बत्ती मैंने बुझा तो दी है
मगर अन्दर की आग मुझे सोने नही देती

अपने मुक़द्दर का हर एक पहलू लिखने कब से तैयार बैठा हूँ
निगाहें पैनी, कानों को तेज़,हाथों को कर होशियार बैठा हूँ
अथक, निरंतर और पिछली बार से मज़बूत मुश्किलें
ये गुण मुझमें भी बो रही है
मेरी आदतें मेरी शर्मिंदगी को धीरे-धीरे धो रही है
नई आदतों को काम पर लगाकर सोचा
आज़ नींद को मंजूरियत मिल जाए
कल की तरह आज भी बत्ती तो मैंने बुझा दी
ये अन्दर की आग कैसे बुझाएँ…

                            -ऐश्वर्य