मैं अंत हूँ या शुरूवात,
मैं सत्य हूँ या विश्वासघात,
मैं मिथ्या या विश्वास,
मैं आह या श्वास.
मैं कल हूँ या मैं आज,
मैं कमज़ोर या आगाज़,
मैं पत्थर या ताज,
मैं स्वयं या मोहताज़.
मैं शांत हूँ या चंचल,
मैं धुप हूँ या आँचल,
मैं शाम हूँ या सवेरा,
मैं मरुभूमि या बसेरा.
मैं तो कागज़ की कश्ती,
जो न महँगी न सस्ती,
न कोई है किनारा,
बस बहती एक धारा ,
धारा वो है जीवन,
धरा मेरा प्रांगन,
जिसपर अस्तित्व मेरा,
मेरा बसेरा |











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