(For the last few days in ‘raahein’ of ISM)
अब कुछ नयी मंजिले अदा कर मुझे ,
पुरानी राहे तो परायी नज़र आ रही है ;
या मिट्टी बना दे इन राहों पे कही ,
कुछ कदमो से अपनी सी खुशबू आ रही है !
इस हथेली में भरी थी कुछ यादें,
समय की रेत थी, बिखरती जा रही है ;
जो धुल मेरे पैरों से चिपकी थी,
समय की रेत थी छूटती जा रही है !
अब कुछ नयी मंजिले अदा कर मुझे ,
पुरानी राहे तो परायी नज़र आ रही है ;
जलता हूँ मैं हर उस तितली से ,
जो कुसुम की पंखडियों में फँस मर जाती है ‘
अब देर ना कर मुझे एक भँवरा कर दे,
शाम से इन राहों की पंखुडियाँ बंद होती जा रही है !
अब कुछ नयी मंजिले अदा कर मुझे ,
पुरानी राहे तो परायी नज़र आ रही है ;
नागिन सी सम्मोहिनी है, मुझे डसकर,
मेरी हालत पे खिल के हँसी जा रही है ;
मानो मेरी प्रेमिका हो , मुझसे नज़र मिला के,
गेरो की बांहों में समाती जा रही है !
अब कुछ नयी मंजिले अदा कर मुझे ,
पुरानी राहे तो परायी नज़र आ रही है ;
नहीं..नहीं कोई मंजिल अदा कर मुझे ,
ये राहें जो परायी नज़र आ रही है ;
इन्ही राहों पे बस कोई पत्थर कर दे ,
इनसे बड़ी अपनी सी खुशबू आ रही है !
















